By CO2027 Seniors – Ami Bhatu, Awdhoo Kakkar, Prisha Jain and Divyanshi Aggarwal.
लोग कहते हैं कि गए वे दिन जब भाषा केवल संचार का माध्यम ही नहीं बल्कि अपनी भावनाओं व्यक्त करने का माध्यम हुआ करती थी।
मैं इन लोगों को गुलज़ार, जॉन इलिया या हरिवंश राय की कविताओं को कैसे समझाऊँ? आज जब मैं युवाओं को अंग्रेज़ी के पीछे भागते देखती हूँ तो खफा हो जाती हूँ क्योंकि ये लोग अपनी पहचान के साथ कमजोर हैं और वे अंग्रेज़ी को अपनी पहचान के रूप में दिखाते हैं । मैं इनको कैसे समझाऊँ कि हिन्दी कैसे हमको जोड़ती है, हमें अपने इतिहास से, हमें एक समाज के रूप में और कैसे हिन्दी हमारे मन की गहराइयों को व्यक्त करने का माध्यम है। हिन्दी मेरे लिये एक डोर है जो मुझे मेरे अस्तित्व से जोड़े रखती है।
अमी भाटू, कक्षा १२
हर वर्ष १४ सितम्बर को विद्यालयों में भाषण होते हैं, कविताएं सुनाई जाती हैं और हिन्दी के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, पर एक प्रश्न मन में उठता है: क्या हिन्दी दिवस केवल एक दिन का उत्सव है ? इस दिन का अर्थ हिन्दी को सम्मान देना, इस दिन हिन्दी बोलना, या निबन्ध लिखना नहीं है बल्कि उसे सहजता से अपने जीवन में अपनाना है । आज हम शिक्षा के क्षेत्र, तकनीक व मीडिया में अंग्रेज़ी का व्यापक प्रयोग करते हैं क्योंकि यह भाषा हमें दुनिया से जोड़ती है और नये आर्थिक अवसर पैदा करती है । फिर भी हमें आर्थिक लाभ के लिये हिन्दी को पीछे नहीं छोड़ देना चाहिये। ये दोनों भाषाएं हमारे जीवन का बराबर हिस्सा हो सकती हैं, जहाँ अंग्रेज़ी हमें दुनिया से जोड़ती है वहीं हिन्दी हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती है ।
अवधू कक्कड़, कक्षा १२
“कल मैं meeting के लिये थोड़ा late हो जाऊँगा” जैसे वाक्यों के बारे में आपके क्या विचार हैं?
“कल मैं meeting के लिए थोड़ा late हो जाऊँगा” आजकल ऐसे वाक्य हमारी प्रतिदिन की बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं। हम हिन्दी बोलते हुए अक्सर अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग कर लेते हैं। स्कूल, सोशल मीडिया, और तकनीक की वजह से हिंग्लिश का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। मेरे अनुसार हिंग्लिश हिन्दी भाषा को कमज़ोर नहीं कर रही बल्कि उसे वक्त साथ बदल रही है। युवाओं के लिए यह आम बोलचाल का एक हिस्सा बन चुका है। वे लोग जो हिन्दी को कम जानते या समझते हैं वे भी हिंग्लिश के माध्यम से हिन्दी का अनुभव कर पाते हैं ।
प्रिशा जैन, कक्षा १२
हिन्दी मेरी पहचान है, मेरी मातृ भाषा है । जब भी मुझे मेरे अहसास व्यक्त करने होते हैं तो बिना समझे हिन्दी में बात करने लग जाती हूँ ।यह दिखाता है कि आपकी भाषाओं पर कितनी भी अच्छी पकड़ क्यों न हो, आप लौटकर अपनी मातृभाषा पर आ जाते हैं। वैसे ही मैं भी हर परिस्थिति में लौटकर हिन्दी पर आ जाती हूँ। मेरे मन व विचारों में जो गहराई हिन्दी के लिए है वह और किसी भाषा के लिए नहीं है। अगर मैं अपने दोस्तों के साथ अंग्रेज़ी में बात करती हूँ तो बीच बीच में हिन्दी बोलना शुरू कर देती हूँ क्योंकि हिन्दी मेरे खुद का एक बहुत ही महत्तवपूर्ण हिस्सा है। इसी तरह जो अपनापन मुझे हिन्दी गानों में मिलता है, किसी और भाषा में नहीं। हिन्दी गीतों में जिस तरह भाव व्यक्त किये जाते हैं, जिस तरह कहानियाँ कही जाती हैं मेरे लिये वह किसी और भाषा में नहीं हो सकता। हिन्दी के लिये मेरे दिल में जो जगह है वह कोई और भाषा नहीं ले सकती चाहे उस भाषा पर मेरी कितनी ही मजबूत पकड़ क्यों न हो।
दिव्यांशी अग्रवाल,कक्षा १२

